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मेरी बहती आँखों के सपने सारे

ठहरे हैं …

 

मैं उजली रातों में शायद

जग भी जाता , क्या होता

मैं तन के दागों को शायद

धक भी जाता , क्या होता

क्या होता ,जब मेरी रातों पर यादों के पहरे हैं

क्या होता, जब मन के दाग ही इतने गहरे हैं

मेरी बहती आँखों के सपने सारे

ठहरे हैं …

 

मैं रो लेता , पहले भी तो

कितने मौके आए थे ।

मेरे तन्हा दिल ने पहले भी तो

धोखे खाए थे।

ये आँसू पर जाने कितने दिन से यूं ही ठहरे हैं

और संयम के बंधन सारे रेत से ढ़हरे हैं

मेरी बहती आँखों के सपने सारे

ठहरे हैं …

 

इतना पागल कर देता था , प्यारा सा

एक वो चेहरा,

कि मेरे मन का दीवानापन ,बस जख्मों

को पा कर ठहरा,

जितने मुझको जख्म लगे, सब होते जाते गहरे हैं

मैं ठहरा हूँ , दिल ठहरा है , पर वक़्त कहाँ कब ठहरे है

मेरी बहती आँखों के सपने सारे

ठहरे हैं …

 


 

… ओस की बूँद न बन जाना

प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहना चाहता है कि उसके जीवन में खुशियाँ लाने के बाद कहीं वो उसे छोड़ कर चली न जाये ………..

 

तुम आए जीवन में मेरे, उस पल

जब थे घने अंधेरे

तुमने मेरा साथ दिया तो ,

मैंने देखे नए सवेरे

मेरी पलकों को अपना कर

अपने सपने मुझे दिखा कर

दिल से तुम ना मुझे गिराना

तुम ओस की बूँद न बन जाना

 

तुमसे मिल कर मैंने जाना

क्या होता है सपनों का उड़ना

तुमसे मिल कर ही तो सीखा

दिल ने आशाओं से जुड़ना

जब भी आँखें बेबेस हो कर

कुछ बूँदें खोना चाहती थी,

तब मेरे इस तन्हा मन को

तेरी बाँहें मिल जाती थी।

अब मैंने अहसास किया ,

वो लम्हा दिल का हो जाता था

आँखों से बूँदों को खो कर

दिल कितना हल्का हो जाता था

आशाओं के पंख लगा कर

मुझको उड़ना सिखला कर

तुम छोड़ न ये दामन जाना।

तुम ओस की बूँद न बन जाना।

 

तुमसे मिल कर मैंने जाना

दिल की धड़कन का मतलब क्या है।

क्यों प्रेमी इसको हैं सुनते

क्यों धड़कन से धड़कन बुनते ।

क्यों दिल की धड़कन केवल

जिंदा रहने की नहीं निशानी।

क्यों ये धड़कन बढ़ जाती है

जब मिल जाती है प्रीत सुहानी।

कैसे अरमानों के बादल ,

तेरी एक आहट को चाहें।

कैसे तेरी हर एक आहट

चाहत की बारिश ले कर आए.

चाहत के बादल बरसा कर,

अपना सागर मुझे बना कर

किसी और नहीं सागर जाना ।

तुम ओस की बूँद न बन जाना।

 

 

 


 

तुम आ जाओ

काफी अरसा बीत गया है लेकिन प्रेमी अपने प्रिय के दूर जाने के बाद भी उसको भुला नहीं पाया है . वो अपने प्रेमी को याद करता है और खुद को एक सुखी धरती से सामान बताता है जो बदल का इंतज़ार सदियों से कर रहा है …. 

 

कितने प्यार के सावन बीते

कितनी जगह फुहार पड़ी

पर मेरे दिल का सुखा कोना

कतरे कतरे को तरसा है

सदियों बाद ये तुम आए हो

तो प्यार घडी भर को बरसा है

मैं प्यासी सुखी धरती हूँ

तुम मेरे बदल काले हो

तुम आ जाओ , आ जाओ ना, कह दो तुम आने वाले हो

 
 

 

जितना तन्हा मैं लगता था

उससे ज्यादा मैं तन्हा था

अब तन्हा रहता हुईं लेकिन

दिल का साथ नहीं तन्हा है

रात भले तन्हा हो मेरी

पर जज्बात नहीं तन्हा है

मेरी आखों का सूनापन आज नहीं है वो तन्हा है

मेरे बोलो की खामिशी आज नहीं है वो तन्हा है

तन्हा हर वो शय है जिसने पहले मुझको तन्हा किया था

वो तन्हाई जो पहले थी आज नहीं हैं वो तन्हा है

मुझसे आज सुबह ने पुछा तुम इतने बदले से क्यूँ हो ?

मैं बोला देखा था सपना की तुम फिर आने वाले हो

तुम आ जाओ , आ जाओ ना, कह दो तुम आने वाले हो

मैं प्यासी सुखी धरती हूँ

तुम मेरे बदल काले हो

तुम आ जाओ , आ जाओ ना, कह दो तुम आने वाले हो

 

 

दो प्रेमी बड़े प्यार से एक दुसरे  के साथ उपवन में दुनिया से छुप कर बैठे हैं . प्रेमिका प्यार करना चाहती है  , लेकिन प्रेमी किसी बात पर चिड जाता  है. प्रेमिका खूब प्रयास करती है कि उसके प्रेमी का मूड ठीक हो जाए , पर प्रेमी अड़ा रहता है. काफी देर बीतने पर प्रेमिका नाराज हो जाती है , लेकिन गुस्सा दिखाती नहीं, केवेल मुँह फेर कर बैठ जाती है . तब, प्रेमी को  अपनी गलती का  अहसास होता है. वो प्रेमिका को को  मनाने के लिए इस कविता को लिखता है . पढ़िए …..

 
 

तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !

आँखों मैं तेरी प्यार था 

दिल मैं तेरे इकरार था

होटों पे  था इशारा 

तुम प्यार करना चाहती थी

पर मैंने चढ़ा लिया पारा !

तुम फिर भी रही चंचल ,

स्नेह रखा निश्चल ,

मैं और चिढ़ा बेचारा !

अब मानता – हुईं गलती , मैं तुमको मनाऊंगा

तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !

 

फिर मैंने प्यार से , धीरे से कहा 

कि अब ज्यादा बकवास न करो!

बुरा मान गयी, जब मैंने तुम्हें टोक दिया

रोना चाहती  थी , मगर आसुओं को रोक लिया

तुमने सोचा , ये आंसू अभी ना खोउंगी

जब ये बुद्धू मनायेगा , तब रोउंगी

मान जाओ, मना रहा हूँ अब ,

वर्ना मैं चला जाऊंगा

तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !

 

जानता हूँ , क्यूँ नाख़ून खरोंच रही हो

जानता हूँ , क्या सोच रही हो

सोच रही हो – “किया क्या था ,

लेकिन ,बता क्या रहा था  !”

कहता है “प्यार से , धीरे से कहा.”

जबकि चिल्ला कर कहा था !

चलो मानता हूँ – झूठ बोला !

सुनो, अब तो माफ़ कर दो

शाम  तक सता लो मुझे  ,

रात तक दिल साफ्ह कर दो

देखो इस तरह रूठी रही तो , मैं सो नहीं पाउँगा

तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !

 

गुस्सा जायज है, मैं मानता हूँ  

क्यूँ चुप हो , ये भी जानता हूँ

जाताना चाहती हो, कि हूँ गैर ,

बताना  चाहती ही – कोई  अपना होता

तो थोड़ी तकरार करती , कुछ देर झगडती

फिर देर तक प्यार करती

सीने से लगा लो अब ,नहीं तो चला जाऊंगा ,

तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !

 

प्रेमिका कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जा रही है ! प्रेमी को ये बात चुभ रही है I वो प्रेमिका को प्यार  से इस कविता में ताने मार रहा है

 
 

वो जाती है तो जाए ,मुझे ना बताये

 
 

जो उसके महकते बदन से ,

आती है खुशबू , जैसी आऐ चमन से

मैं फूलों से खेलूँगा , वो न तरस खाए

वो जाती है तो जाए ,मुझे ना बताये .

 
 

जो कहती थी मुझसे , शर्मा के , रुक रुक के -

तुम मेरी गली आना , देखूँगी चुप चुप के

अब उस राह ना गुजरूँगा , वो ख़ुशी से जाए

वो जाती है तो जाए ,मुझे ना बताये .

 
 

जो हाथ को जकड के ,  वो कहती थी हमसे

एक पल न रह सकूंगी , बिना आपने सनम के !

वो दूसरा सनम है , हम दिल को ये  समझायें

वो जाती है तो जाए ,मुझे ना बताये

 
 

ये तुम कैसे बदल गए !

प्रेमी के  बहुत वर्षों तक असीम प्यार करने  वाली प्रेमिका अचानक प्रेमी को छोड़ कर जाने को तेयार है. प्रेमी लिखता है …

 
 

ये तुम कैसे बदल गए !

 
 

मुझसे करते थे , प्रेम अपार

जीवन से  ज्यादा मुझे चाहने वाले तुम

अब, मुझमे दूढ़ते हो विकार

मैं जिनकी हुआ करता था बैसाखी ,

वो मेरे बिना कैसे चल  गए ?

ये तुम कैसे बदल गए !

 

थी , हमसे उनकी जिंदगी,

हमसे  ही थी ख़ुशी

जो हँसते थे कभी साथ मेरे ,उनकी

गूंजती है अब हम पर हँसी

मुझको जलने वाले ,ज़रा सी बात पर

खुद कैसे  जल गए ?

ये तुम कैसे बदल गए !

 

उनकी चाहत का था , अलग अंदाज़ 

झगड़ने पर जो हँसते थे  ,

जरा सा हँसने पर

झगड़ते हैं आज !

जिनके लिए था मैं गिरा , वो मुझे छोड़

खुद कैसे संभल गए ?

ये तुम कैसे बदल गए !

 

उन्होंने पढाया था , मुझे, वफ़ा का पाठ !

मुझे बंधन में बाँधने वाले वो,

अब खुद खोल रहे  गाँठ !

जो भावना से थे भरे

मेरी भावनाओं को , वो

कैसे छल गए?

ये तुम कैसे बदल गए !

 

उनके लिए , मैं ही था पहले , और

मैं ही था “बाद”

छोड़ते नहीं थे साथ पल भर का जो

करते नहीं  अब हमको याद

सोचा था कल मिलेंगे वो, बीत

जाने कितने ऐसे कल गए.

ये तुम कैसे बदल गए !

 

ना बँधे जो हम तुम बंधन में , तो प्रेम की डोरी कसना ना

 
 

शायद वो घड़ी भी आएगी, जो मुझे रुला कर जाएगी

ना बोल सको तो ना कहना ,विरोध ना करना चुप ही रहना

तुम हँसी हँसी हो जाना दूर , कह देना कि हो मजबूर

मैं हँसी हँसी कर दूंगा विदा, हर साँस हर धड़कन तुझ पे फ़िदा ,

मेरे प्यार की गहराई  में उतरो , दीवाना कह कर  हँसना ना

 
 

ना बँधे जो हम तुम बंधन में , तो प्रेम की डोरी कसना ना

 

 तुमसे सपने सजे हैं मेरे, तुम से मैंने संसार सजाया

बाँहों का  मुझको देना प्यार, आँचल की तुम देना छाया

मेरे आँगन की तुम ज्योति , खुशियों  की माला के मोती

पर पुरवाई के चलने पर, सागर में भाटा चढने पर

किसी और के आँगन में जलना, किसी और की माला में पलना

तुम जाना , लाख ख़ुशी से जाना ! पर दूर अभी से बसना ना

 

ना बँधे जो हम तुम बंधन में , तो प्रेम की डोरी कसना ना

प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ प्यार भरे पल बिताने को आतुर है, पर प्रेमिका की हया उसे मधुर अहसास पाने नहीं दे रही है. ऐसे में प्रेमी अपने मन की भावनाओं को कुछ इस तरह से व्यक्त करता है …

खुली हुई लटें तेरी ,

उँगलियों पे लपेटे अपनी

मैं कहता रहूँ कुछ , और

तू सुनती ही रहे .

मैं जज्बात बयां कर दूँ

अल्फाजों में,

तू उनकी ताबीर

ख्यालों में बुनती ही रहे .

मेरे जज्बात का झोंका

तेरी आंखों को भीगा जाए

और तू कहे की पड़ा है तिनका .

ला तेरी आँख का तिनका, इसे मैं दूर कर दूँ

आ तुझे प्यार मैं जी भर के करूँ, आ तेरी माँग में सिंदूर भर दूँ.

ये कैसी तड़प है ,

कि बुझती ही नहीं है

ये कैसा सफ़र है ,

कि मंजिल ही नहीं है

चाहतों के भँवर में,

खा रहे हैं चक्कर

बस लहर-लहर है,

साहिल ही नहीं है .

तुझे बाहों मैं छुपा के,

तेरी धड़कन को सुनूं तो,

तू हट जाए लजा के .

ला तेरी हया का आइना, इसे मैं चूर कर दूँ

आ तुझे प्यार मैं जी भर के करूँ, आ तेरी माँग में सिंदूर भर दूँ.

सुनिए साहिल की आवाज़ में

प्रेमी रोने का महत्व जान तो गया पर अकेले रो लेना उसे गवांरा नहीं. दुनिया के सामने रोना भी उसके अहम को स्वीकार नहीं .अकेलेपन और उदासी मे प्रेमी अपने प्रिय को करता है – उस प्रिय को जो उसकी जिंदगी से दूर जा चुका है .प्रेमी अपने प्रेमी के लौटने की आशाएँ रखता है ताकि वो अपने पुराने प्यार को फिर पा सके और अपने प्रेमी के स्नेह को महसूस कर सके. प्रेमी एक बार अपनी प्रेयसी की गोद मे सर रख कर रोना चाहता है ,अपने गम भूलना चाहता है, सुकून पाना चाहता है. वो एक ऐसा रुदन चाहता है जो उसकी प्रयसी के दिल मे पुराना प्रेम जगा दे , और वो भी उसके दुःख और रुदन को देख कर रो दे. यही रुदन उस प्रेमी की तड़प है. ये कविता इसी तड़पते प्रेमी के नाम है …

 

एक रुदन ऐसा की बह जाए सारे,

वो आँसू , जमा है जो लेकर ,

दर्द को मेरी पलकों के भीतर

खुशियों के लिए खाली कर दें किनारे

ये हो भी जाए , मगर तू प्यार से तो मिल

एक रुदन को तड़पता है दिल…

 

एक रुदन ऐसा , न अवरोध हो

जहाँ सर हो मेरा , तेरी गोद हो

आसुओं की बहती एक कतार हो

जो बाहों में थामे वो तेरा प्यार हो

की प्यार मिले, दुलार मिले, सुकून हो हासिल

एक रुदन को तड़पता है दिल…

 

एक रुदन ऐसा कि छा जाए खामोशी

रगों में बहता प्यार , ले फिर अंगडाई

बिखरी हुई यादें फिर दे दिखाई

मेरी धडकनों कि आवाज दे तुझे ऐसी मदहोशी

प्यार का खिचाव हो, रो तू भी दे कातिल

एक रुदन को तड़पता है दिल…

..पर तुम तो रो लो

सुनिए साहिल की आवाज़ में

कुछ परिस्थितियाँ इन्सान को बहुत कमजोर बना देती हैं. कई लोग तो ना केवल भीतर से कमजोर हो जाते हैं, अपितु उनका बाहरी स्वरूप भी उनकी कमज़ोरी को दिखाने लगता है. पर कई लोग ऐसे होते हैं जो कमजोर तो हो जाते हैं पर उनका अहम इस तथ्य को मान नहीं पाते. वो हर वक़्त गुमसूम तथा उदास रहते हैं पर कभी रो नहीं पाते , शायद इसलिए की उनकी नज़रो मैं रोना उनकी कमज़ोरी का प्रेतीक है. इस कविता का कवि इन्ही   लोगो मैं से एक है. वो एक ऐसे ही कठिन वक़्त मैं अपने गुम सूम और उदास व्यक्तित्व का उपहास करता हुआ कहता है – ” तेरी दुनिया उजड़ गई है और तेरा दिल टूट चुका है. तू रोना चाहता है पर बाकी दुनिया खुश नज़र आ रही है और तेरे दुख से अनजान नज़र आ रही है इसलिए तू शर्मा रहा है. अरे नादान ! ये दुनिया वाले तो पत्थर है . ये उस चाँद की तरह तेरे दुख से अंजान हैं , अंधे हैं . पर तू तो अपना दुख को समझता है. रो ले ! ये अंधे तेरी मदद नहीं कर पाएँगे .

 

है दिल तेरा टूटा

पर आँसू  ना बहाता

तू चुप ही रहता

क्यूकी चाँद है मुस्कुराता

अरे दुख अपना दीवारों से चीख चीख बोलो

है चंदा तो अँधा, पर तुम तो रोलो

 

कोशिश बहुत की

पर मंज़िल ना पाई

इज़्ज़त भी खोई

ठोकर भी खाई

अरे चेहरा अपना आसुओं  से धोलो

है चंदा तो अँधा, पर तुम तो  रोलो

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