कुछ परिस्थितियाँ इन्सान को बहुत कमजोर बना देती हैं. कई लोग तो ना केवल भीतर से कमजोर हो जाते हैं, अपितु उनका बाहरी स्वरूप भी उनकी कमज़ोरी को दिखाने लगता है. पर कई लोग ऐसे होते हैं जो कमजोर तो हो जाते हैं पर उनका अहम इस तथ्य को मान नहीं पाते. वो हर वक़्त गुमसूम तथा उदास रहते हैं पर कभी रो नहीं पाते , शायद इसलिए की उनकी नज़रो मैं रोना उनकी कमज़ोरी का प्रेतीक है. इस कविता का कवि इन्ही लोगो मैं से एक है. वो एक ऐसे ही कठिन वक़्त मैं अपने गुम सूम और उदास व्यक्तित्व का उपहास करता हुआ कहता है – ” तेरी दुनिया उजड़ गई है और तेरा दिल टूट चुका है. तू रोना चाहता है पर बाकी दुनिया खुश नज़र आ रही है और तेरे दुख से अनजान नज़र आ रही है इसलिए तू शर्मा रहा है. अरे नादान ! ये दुनिया वाले तो पत्थर है . ये उस चाँद की तरह तेरे दुख से अंजान हैं , अंधे हैं . पर तू तो अपना दुख को समझता है. रो ले ! ये अंधे तेरी मदद नहीं कर पाएँगे .
है दिल तेरा टूटा
पर आँसू ना बहाता
तू चुप ही रहता
क्यूकी चाँद है मुस्कुराता
अरे दुख अपना दीवारों से चीख चीख बोलो
है चंदा तो अँधा, पर तुम तो रोलो
कोशिश बहुत की
पर मंज़िल ना पाई
इज़्ज़त भी खोई
ठोकर भी खाई
अरे चेहरा अपना आसुओं से धोलो
है चंदा तो अँधा, पर तुम तो रोलो