दो प्रेमी बड़े प्यार से एक दुसरे के साथ उपवन में दुनिया से छुप कर बैठे हैं . प्रेमिका प्यार करना चाहती है , लेकिन प्रेमी किसी बात पर चिड जाता है. प्रेमिका खूब प्रयास करती है कि उसके प्रेमी का मूड ठीक हो जाए , पर प्रेमी अड़ा रहता है. काफी देर बीतने पर प्रेमिका नाराज हो जाती है , लेकिन गुस्सा दिखाती नहीं, केवेल मुँह फेर कर बैठ जाती है . तब, प्रेमी को अपनी गलती का अहसास होता है. वो प्रेमिका को को मनाने के लिए इस कविता को लिखता है . पढ़िए …..
तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !
आँखों मैं तेरी प्यार था
दिल मैं तेरे इकरार था
होटों पे था इशारा
तुम प्यार करना चाहती थी
पर मैंने चढ़ा लिया पारा !
तुम फिर भी रही चंचल ,
स्नेह रखा निश्चल ,
मैं और चिढ़ा बेचारा !
अब मानता – हुईं गलती , मैं तुमको मनाऊंगा
तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !
फिर मैंने प्यार से , धीरे से कहा
कि अब ज्यादा बकवास न करो!
बुरा मान गयी, जब मैंने तुम्हें टोक दिया
रोना चाहती थी , मगर आसुओं को रोक लिया
तुमने सोचा , ये आंसू अभी ना खोउंगी
जब ये बुद्धू मनायेगा , तब रोउंगी
मान जाओ, मना रहा हूँ अब ,
वर्ना मैं चला जाऊंगा
तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !
जानता हूँ , क्यूँ नाख़ून खरोंच रही हो
जानता हूँ , क्या सोच रही हो
सोच रही हो – “किया क्या था ,
लेकिन ,बता क्या रहा था !”
कहता है “प्यार से , धीरे से कहा.”
जबकि चिल्ला कर कहा था !
चलो मानता हूँ – झूठ बोला !
सुनो, अब तो माफ़ कर दो
शाम तक सता लो मुझे ,
रात तक दिल साफ्ह कर दो
देखो इस तरह रूठी रही तो , मैं सो नहीं पाउँगा
तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !
गुस्सा जायज है, मैं मानता हूँ
क्यूँ चुप हो , ये भी जानता हूँ
जाताना चाहती हो, कि हूँ गैर ,
बताना चाहती ही – कोई अपना होता
तो थोड़ी तकरार करती , कुछ देर झगडती
फिर देर तक प्यार करती
सीने से लगा लो अब ,नहीं तो चला जाऊंगा ,
तुम गुस्सा छिपा के देखो, मैं प्यार छुपाऊँगा !