मेरी बहती आँखों के सपने सारे
ठहरे हैं …
मैं उजली रातों में शायद
जग भी जाता , क्या होता
मैं तन के दागों को शायद
धक भी जाता , क्या होता
क्या होता ,जब मेरी रातों पर यादों के पहरे हैं
क्या होता, जब मन के दाग ही इतने गहरे हैं
मेरी बहती आँखों के सपने सारे
ठहरे हैं …
मैं रो लेता , पहले भी तो
कितने मौके आए थे ।
मेरे तन्हा दिल ने पहले भी तो
धोखे खाए थे।
ये आँसू पर जाने कितने दिन से यूं ही ठहरे हैं
और संयम के बंधन सारे रेत से ढ़हरे हैं
मेरी बहती आँखों के सपने सारे
ठहरे हैं …
इतना पागल कर देता था , प्यारा सा
एक वो चेहरा,
कि मेरे मन का दीवानापन ,बस जख्मों
को पा कर ठहरा,
जितने मुझको जख्म लगे, सब होते जाते गहरे हैं
मैं ठहरा हूँ , दिल ठहरा है , पर वक़्त कहाँ कब ठहरे है
मेरी बहती आँखों के सपने सारे
ठहरे हैं …